गजल संग्रह : हासिल-ए-सहरा नवर्दी
काम दुश्मन का मैं आसान किये जाता हूँ
अपनी बरबादी का सामान किये जाता हूँ
रोज़ मोहलत दिये जाता हूँ तेरे साथ हूँ मैं
ज़िन्दगी! तुझ पे ये एहसान किये जाता हूँ
बस वही है जो ग़ज़ल मुझ से कहलवाती है
जमअ (संग्रह) इस तर् ह मैं दीवान (कविता संग्रह) किये जाता हूँ
ताकि तन्हाई भी शिक्वा न करे तंगी का
घर से बाहर सर-ओ-सामान (सामग्री) किये जाता हूँ
जानता हूँ वो मिरा दुश्मन-ए-जाँ है फिर भी
जान-ओ-दिल उस पे ही क़ुरबान किये जाता हूँ
मुद्दतों दिल ने परेशाँ मुझे रक्खा ‘तालिब’
मैं भी अब दिल को परेशान किये जाता हूँ
■ मुरलीधर शर्मा ‘तालिब’, संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध), कोलकाता पुलिस
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